Glimpses of Morari Bapu’s Ram Katha to the extent I could understand

गुड़गाँव राम कथा के कुछ बिंदु

भगवान राम को जब वनवास हुआ तो उन्हें एक भी ऋषि मुनि ने राज महल को लौट जाने के लिए नहीं कहा. ऋषि मुनि तो चाहते है की राम दुरितो और वंचितों के बिच रहे, राज महलों में नहीं.

बुद्धि बाहर की और जाने वाली चेतना है. श्रद्धा अंतर्मुखी चेतना है. सती दक्ष की पुत्री है. वह बहोत तर्क वितर्क करती है और राम का अस्तित्व प्रमाणित करना चाहती है. वह बुद्धि का प्रतीक है. जब यह बुद्धि यज्ञ में आहूत हो जाती है तो अंतर्मुखी चेतना बन जाती है. पार्वती श्रद्धा का प्रतीक है.

भगवान राम के पास ऐसा सुख है जो काल, देश और व्यक्ति निरपेक्ष है.
राम को जब महाराज दशरथ ने कहा की कल उनका राज्याभिषेक होने वाला है तो उनमे उतनी  ही सुख और प्रसन्नता थी जितनी उनको कैकयी माता ने वनवास की आज्ञा करने पर थी.
राम वन में भी उतने ही सुखी और प्रसन्न थे जितने वो अयोध्या में थे.
राम कैकेयी माता से बात करते वक़्त उतने ही सुखी और प्रसन्न रहते थे जितने वे लक्ष्मण के साथ होने से रहते थे.

 

कोलकाता रामकथा २०११ का एक प्रसंग (A glimpse of Kolkata Ram Katha 2011)

भगवान राम का अपराध तो रावण ने किया और इन्द्र के बेटे जयंत ने भी किया.
रावण ने सीता का अपहरण किया लेकिन उसके साथ किसी तरह का अभद्र व्यवहार नहीं किया. रावण ने सीता के अंग को अभद्र रूप से स्पर्श नहीं किया. उसने सीता को अपहरण के बाद अपने घर में न रखते हुए उसे मर्यादापूर्वक अशोक वन में रखा.
जयंत ने जब राम और सीता चित्रकूट में एकांत में बैठे थे तब सीता के पैर में चोच मारकर उसे घायल किया. वाल्मीकि रामायण में तो उल्लेख है की उसने सीता के वक्ष स्थल पर चोच मारी. वैसे देखा जाए तो जयंत का अपराध तो बहोत बड़ा है लेकिन राम ने उसे क्षमा कर दिया. और रावण को तो सकुल सदल मारा. रावण के शरीर के टुकड़े टुकड़े किये. उसके पेट के भीतर जो अमृत का कुम्भ था उसे नष्ट करके उसे मारा.
यह देखने में तो बड़ी विचित्र बात लगती है. लेकिन ऐसा इसलिए किया क्यों की जयंत कौवे का भेष बनाकर आया था और रावण साधू का वेश बनाकर आया. भगवान को दंभ और भेद कतई पसंद नहीं आता.

Manas 700, Day 1 – Ram Katha by Morari Bapu at Kailash Mansarovar as far as I understood.

सरापा राज हूँ मै जो हूँ मगर
ज़माने को मै समझा नहीं सकता

रहता है इबादत में सदा जान का खतरा
हम याद ए खुदा करते है कही कर न ले खुदा याद

राम सत्य है. कृष्ण प्रेम है. शिव करूणा है.

सत्य, प्रेम, करूणा जय पराजय से परे है.
इसलिए रामचंद्र भगवान की जय कहने से रामचंद्र भगवान प्रिय हो कहे.
बालकृष्ण भगवान की जय कहने से बालकृष्ण भगवान प्रिय हो कहे.
शंकर भगवान की जय कहने से शंकर भगवान प्रिय हो कहे.

 

 

 

गुरु को चार चीजे प्रिय होती है –
१. ऊंचाई – उसे हल्का विचार नहीं भाता, हल्का दर्शन नहीं भाता.
२. स्थिरता – गुरु को अस्थिरता पसंद नहीं.
३. शीतलता – गुरु उग्र नहीं होता. महादेव ने काम को जलाया, राम को नहीं.
४. अविचलता

कुछ तत्व संसार में ऐसे होते है जिन्हें माना जाता है जाना नहीं जाता.

गुरु महावीर होता है. वह षडरिपु से ऊपर होता है.

गुरु हनुमान है. वह अपनी मान सम्पदा बाट देता है.
सर्व मानप्रद आपु अमानी.
वह गति, पवित्रता और जीवन का दाता है.

**************Day 2*****************

हम भीतर के कैलाश की ओर चले.
भीतर की तबियत बिगड़े तो क्या करे.

सिकंदर ने उसके लोगो को वह मर जाने के बाद  ३ सूचनाओ का पालन करने को कहा था.
१. उसकी अर्थी को चार डॉक्टर उठाये. आदमी कितना भी रहिस क्यों न हो और उसे कितने ही डॉक्टर की निगरानी में क्यों न रखा जाए उसे मृत्यु तो आती ही है.
२. उसकी दौलत को मरने के बाद सरे आम उड़ेल दिया जाय.  उसने हासिल भी लोगो से किया था सो वो उनको लौटाना चाहता था.
३. उसके दोनों हाथो को जनाजे के बाहर रखना, खाली. तात्पर्य वह आया भी खाली हाथ था और जा भी खाली हाथ रहा है. कुछ लोग ऐसा भी कहते है की जिंदगी भर मांगने से भी उसकी तसल्ली नहीं हुई सो वह जाते वक़्त भी मांगना चाहता था हाथ पसारकर. यह एक विनोद की बात है.

ज्ञान विज्ञान से तृप्ति हुए बिना तसल्ली नहीं होती. ऐसा भगवत गीता कहती है. गीता और रास्ते भी दिखाती है.

मृत्यु आने पर उपाय, निष्कर्ष या अंतिम परिणाम नहीं होता है.

भीतर की बीमारी के लिए हरिनाम ही जरुरी है. औषधि काम नहीं करती है.

शुभ भाषा का प्रयोग भीतरी और शरीरी स्वास्थय के लिए अच्छा है. शुभ भाव और शुभ दर्शन भी स्वास्थ्य के लिए अच्छा है.

कैलाश में कथा करना या ७०० कथा करना यह कोई रिकार्ड बनाने के लिए नहीं किया गया. यहाँ तो सबके रिकार्ड टूटते है.

पीछे वालो से मत कहो की मै आगे हूँ. आगे बहोत लोग है.

७०० नाम इसलिए की मानस में ७ सोपान है.

राम चरित मानस में ११ बार कैलास शब्द प्रयुक्त हुआ है.

इतिहास तथ्यों की खोज में होता है तो अध्यात्म सत्य की.

हनुमान चालीसा का अनुष्ठान करने वाला शुद्ध होता है. विश्व को सिद्धो की नहीं, शुद्धो की जरुरत है.

तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा का समापन कैलाश में किया. राम चरित मानस का समापन चित्रकूट या काशी में हुआ. उसका प्रकाशन अयोध्या में हुआ.

सिर्फ कन्या की ही परीक्षा नहीं, लड़के की भी परीक्षा करे. इसका आधार है राम चरित मानस, सीता का स्वयंवर हुआ था.

हनुमान ११ वे रूद्र है.

हनुमान चालीसा से –
१. व्यक्ति प्राणवान हो जाता है.
२. सिद्धवान हो जाता है.
३. उसमे असंगता आती है.
४. वैराग्य आता है.
५. ज्ञानवान हो जाता है.

दुखो की निवृत्ति वैराग्य के बिना संभव नहीं.
मै पूजा नहीं करता, प्रेम करता हूँ. इसीलिए तो कहता हूँ की सद्गुरु भगवान प्रिय हो.

आप हनुमान चालीसा का अनुष्ठान चाहे न कर सके, जो कर रहा है उसकी आलोचना न करे.

प्रयत्न से नहीं होता. मांगने से आशीर्वाद या आश्वासन मिल सकता है.
बात तो अनुग्रह से बनती है.
शरणागति के पथ पर अनुग्रह के सिवा चारा  नहीं.

कबीरा कुआ एक है, पनिहारी अनेक |
बर्तन सब न्यारे भये, पानी सब में एक ||

नदी से जब पूछा गया की जीवन क्या है, जवाब नहीं दिया बह गयी. बहना ही जीवन है.

जगतगुरु आदि शंकराचार्य कहते है की गुरु के और वेदांत के वाक्य में विश्वास ही श्रद्धा है.

मेरी व्यासपीठ एक श्वासपीठ है.

राम भरत से कहते की हनुमान ने कभी मेरी आज्ञा नहीं तोड़ी. गुरु की आज्ञा ही गुरु का प्रसाद है. गुरु कभी गलत आज्ञा नहीं करता.

साधू एक अलग वेश में क्यों रहते है १. वेश देखकर सामने वाला जान जायेगा और विक्षेप नहीं करेगा. २. स्वयं को निरंतर सावधान करने के लिए. ३. शरीर की सुरक्षा के लिए.

संत मठ का नहीं मन का महंत होता है.

साधू वह जिसके आँखों में प्रेम, करुणा है. चलाखी, शोषण नहीं.

प्रेम जब क्रियान्वित होता है, करुणा बन जाता है.
बर्फ पिघलने से ही जीवन दाता बनता है.
घनीभूत प्रेम जब पिघलता है तो जीवनदायी करुणा बनता है.

साधू की जबान में सत्य होता है, जहा सत्य का उच्चारण मंगलमय नहीं वहा मौन.
कृष्ण ने कर्ण से कहा की तू ज्येष्ठ पांडव है और तू पांडवो के सभी अधिकार प्राप्त कर सकता है. कर्ण कहता है कुछ सत्य अनकहे ही अच्छे होते है. अब मै पांडवो से कैसे लडूंगा, मेरी माँ के प्रति ही मुझ में घृणा हो गयी.

संत का नारायण उसकी जबान पर होता है.

संत के जीवन की गति में लोक मंगल के लिए मर्यादा होती है.

बुद्धि की शुद्धि हरिनाम से होती है.

 

**************day 4***********

श्री हनुमान जी ने सुग्रीव को बाली के त्रास से बचाया.
जानकी जी को दुःख मुक्त किया. *****सुनत ही सीता कर दुःख भागा
लक्ष्मण जी को संजीवनी दी.
भरतलालजी को प्रभु का समाचार सुनाया.
सीता माता की खोज में भटक रहे प्यासे भूखे भालू, बंदरो को तृप्त किया.

दो बाते बेहद जरूरी है – शरीर की स्थिरता और मन की धीरता.
समझ और समय से स्थिरता और धीरता आती है.
महर्षि रमण कहते है की संयम भी आवश्यक है.
हरी स्मरण से संयम भी मिलता है.
सबसे बड़ी विपत्ति है हरि स्मरण का छूटना.
बिपति प्रभु सोई जब तव सुमिरन भजन न होई.
जो व्यक्ति कामना छोड़कर कुछ समय के लिए राम नाम जपेगा उसे रात दिन राम नाम जपने का फल प्राप्त होगा.
हमने जो संतो से सुना है वही आपको सुनाते है.
गावत संतत संभु भवानी
भजन गाना भी भजन है.
भजन गाती है जीभ भजन करता है जीव.
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई जब तव सुमिरन भजन न होई.
उमा कहु मै अनुभव अपना, सत हरिभजन जगत सब सपना.
मन की तरंग मार लो बस हो गया भजन.
कैलाश का अर्थ है ज्ञान, भक्ति और कर्म.
इन तीनो से ही पूर्णता आती है.
कैकेयी कर्म के पथ का प्रतीक है. ठीक संग न होने पर कर्म भ्रष्ट हो जाता है. कर्म मौन होता है.
कौशल्या विवेक का प्रतीक है. विवेक मुखर होता है.
सुमित्रा भक्ति, सुमिरन का प्रतीक है जो मौन भी है और मुखर भी.
मैत्री यह हाथ तालियों का खेल नहीं है. गाली गलोच नहीं है.
शब्द आसान है, उसका वहन बहोत कठिन है.
मैत्री से वैर जुड़ जाता है. यह मित्र है तो वह शत्रु है.
सुग्रीव की राम से मैत्री निभ गयी, विभीषण की राम से मैत्री निभ गयी क्यों की बीच में हनुमान थे.
जो मित्र का दुःख देखने से दुखी नहीं होता उसका चेहरा देखने से पाप लगता है.
सुभाषितकार  भी कहते है की मैत्री दुर्गम है.
राम माने सत्य. सत्य तक पहुचने के लिए हनुमान का अनुग्रह जरूरी है.
प्रेम दुर्गम है.
करुणा दुर्गम है. दया सुगम है. दया तो दिखावे के लिए होती है. बदले में कुछ मिले यह सोच कर होती है.
शंकर दुर्गम है.
करुणा प्रगट होती है भगवान का चरित्र सुनने से.
महर्षि वाल्मीकि ने जब क्रौंच पक्षी के विलाप को सुना तो उन्होंने रामायण की रचना की. रामायण काव्य प्रकटा है शोक से.
राम चरित मानस आनंद से प्रकट हुआ.
गदगद गीरा नयन बह नीरा
मृत्यु दुर्गम है.

हनुमानजी की अनुमति के बिना राम के मंदिर में प्रवेश संभव नहीं. हनुमानजी कुछ प्रश्न पूछते है.

हराम कितना है. यह सत्य का मंदिर है यहाँ असत्य नहीं चलेगा.
कोई निंदा करता है तो उसे यहाँ प्रवेश नहीं है. पीठ पीछे निंदा ना करे. निंदा और स्तुति दंभ युक्त ना हो.
वह पूछते है की आपकी आँख पवित्र है क्या.
किष्किन्धा कांड में केवल विचार है, क्रिया नहीं है. लंका कांड में केवल क्रिया है, विचार नहीं है. सुन्दर कांड में विचार और कर्तुत्व का संयोजन है.
यदि विचार और विश्वास को दो चक्के कहा जाए तो उनके बिच की धरी है विवेक.
अहंकार के जूते बहार रखकर ही मंदिर में प्रवेश संभव है.

 

*************day 5**************

हनुमान चालीसा में चालीस पंक्ति ही क्यों है.

इसका संकेत इस ओर है की चार वास्तु को शुन्य कर दे.

हनुमान चालीसा भी राम कथा है.

रामचरित मानस का संक्षिप्त रूप है सुन्दर कांड और सुन्दर कांड का संक्षिप्त रूप है हनुमान चालीसा.

हनुमान चालीसा का अनुष्ठान संकटों से बचने के लिए और काम निकालने के लिए न करे.

ह्रदय में बैठा हुआ ब्रह्म अक्रिय है. ज्ञान और कर्तव्य बुद्धि उसे सक्रीय कर सकती है.

हनुमान चालीसा मानसिक बीमारी का इलाज है.

 

गीत को ठीक से समझे..

हमने हसरतो के दाग मुहोब्बत में धो लिए

ख़ुशी आपकी हुजुर बोलिए ना बोलिए

भक्ति मार्ग में हसरत दाग है, कलंक है.

कितने हसीं खात मेरी निगाह ने , बड़ी सादगी से भारह रूह में चुभो दिए

जिंदगी का रास्ता तो काटना ही था अदम, उठ गए तो चल दिए थक गए तो सो दिए

घर से चले थे हम ख़ुशी की तलाश में, गम राह में खड़े थे वही साथ हो लिए

 

लक्ष्मण जागृति और होश में किये हुए कर्म का प्रतीक है.

चार वस्तु शुन्य – मन निर्विकार होने लगता है.

मन का निरोध नहीं मन का प्रबोध करो.

एक गुरु ने जब उसे एक शिष्य ने पूछा की भजन माने क्या करे तो कहा की निरंतर सामने मुझे देखा कर.

बुद्ध पुरुष के अगल बगल में मन की निर्विचारता प्राप्त होती है.

बुद्ध पुरुष के निकट जाने से लाभ नहीं, देह अभिमान देगा.

तंत्र मार्ग में हनुमान चालीसा का उपयोग कभी भी ना करे.

शुन्य मानसक होते हुए भी साधक मन को संचालित करता है.

पागल का भी मन शुन्य हो जाता है. ऐसी शुन्यता यहाँ नहीं कही जा रही है.

पैसे के मालिक अच्छे, पैसे के गुलाम किस कम के.

जो दुसरो को दिया जाय उसके हम मालिक, जो न दिया जाये उसके हम गुलाम.

कोई भी वस्तु को नष्ट करना आध्यात्मिकता नहीं है.

मन को सुधार लेना है, खुशबु से भरना है.

बुद्धि का व्यभिचारिणीपन हनुमान चालीसा से रुकेगा.

कुछ न कुछ छूट जाना ही जिंदगी है.

जगत अपूर्ण ही मिलेगा, परमात्मा पूर्ण ही मिलेगा.

विषयी साधक सिद्ध सयाने, त्रिबिध जीव जग बेद बखाने.

७०-८० % लोग विषयी है. २० % साधक और ५-१० % सिद्ध. शुद्ध तो कोई माई का लाल ही मिलेगा.

विषयी लोगो को तीन बातो में रस होता है.

सुत बित लोक इष्णा तिनी.

सुत का मतलब है पारिवारिक सुख की चाह.

स्वार्थ बुद्धि अध्यात्मिक मार्ग में बाधा न बने.

घर के छोटे बड़ो को सम्मान दे, बड़े छोटो को वात्सल्य दे.

धन सुख में संतोष होना चाहिए.

 

एक राजा को एक सन्यासी ने कहा की उसके यहाँ हर हफ्ते एक एक करके पांच सन्यासी आएंगे.

 

पहले सन्यासी ने जब राजा ने उसे कुछ देना चाहा तो भिक्षा पात्र उंडेला और अनेक रत्न बिखेरे.

दूसरा सन्यासी जब आया तो राजा ने उसे कुछ देने की चेष्टा नहीं की. उसने भी अद्भुत रत्न राजा को प्रदान किये.

तीसरे ने अनेक वरदान प्रदान किये.

चौथे ने भी बहोत दान दिया और पात्र व्यक्तियों को उसे देने के लिए कहा.

पांचवा सन्यासी आया ही नहीं. राजा ने राह देखी. जिस सन्यासी ने पांच सन्यासियों की आने की बात कही थी, वह वापस आया. राजाने कहा की पांचवा सन्यासी तो आया ही नहीं. उसने कहा वह आया था लेकिन आपके इर्द गिर्द के लोगो ने ही उसे जकड़े रखा और वह लौट गया. वह संतोष लाया था.

व्यक्ति राजसिक और सामाजिक सुखो की कामना करता है.

संतोष तो हनुमान की शरण में ही है.

सिद्ध न बन सके तो साधक बने. किसी को किसी प्रकार की बाधा न पहुचाते हुए साधक बने.

परमात्मा की पूजा करे, परमात्मा से प्रेम करे.

कर साहिब की बंदगी, भूखे को कुछ दे.

यह कर्त्तव्य बुद्धि से करे किसी पर अहसान कर रहे है इस भावना से नहीं.

भजन करो भोजन कराओ

मुझे मान मिलने से नहीं, दुसरो को सम्मान देने से मै सुखी होता हूँ.

लोग ऐसा दिखाते है की वे साथ चलते है, पर वे बिलग बिलग होते है.

दो विद्वान् बड़ी लम्बी तीर्थयात्रा कर के एक घर में पहुचे. यजमान ने भोजन करने को कहा. उन्होंने कहा की हम पहले नहाते है फिर भोजन करेंगे.

जब एक विद्वान नहा रहे थे तो यजमान ने दुसरे से पूछा की आपके साथ जो है वो क्या बहोत विद्वान् है? उसने कहा वह तो बैल है, मेरे साथ चलता है तो इज्जत मिलती है.

जब एक नहा कर आये तो दुसरे गए. उनसे जब पूछा की अभी जो नहा रहे है वो क्या बहोत विद्वान् है? उत्तर मिला वो तो घोड़े है सिर्फ चलते है, विद्वत्ता तो सब मेरे पास है.

एक घंटे के बाद यजमान ने भोजन परोसा. एक को भूसा तो एक को चारा.

कठिन तपस्या के बाद अहंकार न आये.

 

सिद्ध तिन सुखो को चाहता है. १. आत्म सुख २. निज सुख ३. परम विश्राम

आत्म सुख माने सकल जन रंजन.

 

भक्त का सुख है प्रभु के गुण गान गाते गाते सुनते सुनते परम विश्राम को पाना.

सुख की उपेक्षा न करे. उसे दुसरो को बाटे फिर भोगे.

धर्म सुख का विरोधी नहीं है पर सुख में सिमट नहीं जाता.

वाल्मीकि आदि कवी है, शंकर अनादि कवी है.

सर्जन को जब अपनी कृति कोई गाता है तो आनंद आता है.

सम्मान को प्राप्त करने से या तो ऐसा निष्कर्ष निकल सकता है की सम्मान देनेवाला सरल है या ऐसा भी निष्कर्ष निकल सकता है की वह तो कुछ भी नहीं है. भरद्वाज जी ने जब सती और भगवान शंकर को सम्मान दिया तो भगवान शंकर ने पहला निष्कर्ष निकला और सती ने दूसरा.

स्वामी विवेकानंद ने कहा है की विश्वास जीवन है और संदेह मृत्यु.

 

**********day 6*********

जो भारतीय परंपरा के शास्त्रीय ग्रन्थ है उनमे आदि, मध्य और अंत में एक ही तत्व प्रतिपादित होता है.
ऐसे ग्रंथो को पूर्ण माना जाता है.
हनुमान चालीसा में आदि, मध्य और अंत में शिव तत्त्व का प्रतिपादन किया गया है.
रामायण में प्रेम तत्व का प्रतिपादन किया गया है.
राम चरित मानस में सत्य तत्त्व का प्रतिपादन किया गया है.

हनुमान चालीसा में कहा गया है की …
सब सुख लहै तुम्हारी चरना, तुम रक्षक कहू को डर ना

इस संसार में जैसा की कुछ लोग कहते है की दुःख ही दुःख है तो ग्रंथो में सुख की चर्चा क्यों है.
यदि सब सारहीन है तो सारभूत की चर्चा क्यों है.
यदि सब विषाद है तो प्रसाद की चर्चा क्यों है.

यह सत्य है की शास्त्र में एक जगह जीवन को दुखालय कहा है पर यह भी सत्य की वहा उस दुखालय को अशाश्वत भी कहा गया है.

आनंद और सुख विरोधी सूत्रों को बिच वाले काल में धर्म में स्थापित किया गया.
आनंद हमारा रूप है. हम अमृत की संतान है.

कभी कभी जो प्रतीत होता है उसका विपरीत ही सत्य होता है. टेढ़े सूत्र में सत्य निर्मित होता है. टेढ़ी ऊँगली से ही घी निकलता है.

एक बहन ने प्रश्न किया है की प्रदोष व्रत का कैलाश में समापन कैसे करे. उत्तर है हरिनाम से.

मै आस्तिक भी नहीं हूँ और नास्तिक भी नहीं हूँ. मै वास्तविक हूँ.

राम चरित मानस अक्षर से प्रारंभ होता है.

हनुमान चालीसा सुख की बात करता है..
सब सुख लहै तुम्हारी चरना, तुम रक्षक कहू को डर ना

राम चरित मानस भी कहता है..

नहीं दरिद्र सम दुःख जग माहि, कोई संत मिलन सम सुख जग नाही.

 

जब राम मिथिला में पुष्प वाटिका में पुष्प चुनने के लिए जाते है तो ऐसा कहा गया है की पुष्प पत्तो में ढके होते है और राम उन्हें ढूंढते है.
पत्तो को दल भी कहते है. राम दल में फसे प्रकाश को खोजते है.
राम कहते है की फूल मेरे आने के बाद भी नहीं खिले. फूल कहते है की हम तो सीता के आने के बाद खिलेंगे. भक्ति के बिना आत्मा खिलती नहीं.

शब्द बोझ ने आदमी को गंभीर बना दिया.
मै अपने उसूलो में इतना सख्त नहीं हूँ.
मै वापिस भी आ सकता हूँ मैं गया वक़्त नहीं हूँ.

लैला का क्या नाम लिया और मस्त हुआ.
तू अल्ला अल्ला बोलता है और कोई मस्ती नहीं.
एक नश्वर सौंदर्य से व्यक्ति खिल जाता है और तुम शाश्वत सौंदर्य की बात कहते हो और उदास हो.

हनुमना चालीसा में कहा गया है..
तुम रक्षक कहू को डरना

शास्त्रों के अनुसार आठ भय कहे गए है…

१. मृत्यु का भय.

समृद्ध को मरने से अधिक डर लगता है. मरण का भय मिटता है स्मरण से.

कबीर तो मौत को कहता है…
जिस मरने यह जग डरे, सो मेरे आनंद |
कब मरिहू कब देखिहू, पूरण परमानन्द ||

कबीर ने मृत्यु को गाया, हमने रोया.

मृत्यु नहीं मिटती उसका भय मिटता है.

२. अपकीर्ति का भय. यह भय गीता का सिद्धांत अपनाने से मिटता है. गीता कहती है की निंदा और स्तुति को एक समान मानो. साधू का मार्ग शूरो का मार्ग है.

३. महा व्याधि का भय. इसका उपाय है देह में आसक्ति को समाप्त करना.

४. भविष्य में क्या होगा इसका भय. यह समर्थ की शरणागति से मिटता है. परम पर भरोसा रखो.

५. असफलता का भय. इसको मिटने का उपाय है की परिणाम की मत सोचो. कर्त्तव्य बुद्धि से कर्म करो.

६. पाप का भय. यह अद्वैत दृष्टि से मिटेगा.

७. कुपंथ पर जाने का भय. सत्य से अभय प्राप्त होता है. सत्य को कुछ साबित नहीं करना पड़ता. असत्य का मार्ग भयभीत करता है. सत्संग से विवेक उत्पन्न होगा, विवेक से सदबुद्धि, सदबुद्धि से निर्भयता प्राप्त होगी.

८. शुद्ध प्रेम के समर्पण का भय. जैसे कैकयी को भरत के शुद्ध प्रेम का भय था. उसे लगता था की राम के प्रति जो भरत का प्रेम है उससे उसे राज्य नहीं मिलेगा.

राम तत्व की समीक्षा या परीक्षा नहीं की जाती है. उसकी प्रतीक्षा की जाती है.

मैं मानस मर्मज्ञ नहीं हूँ. राम का मार्ग जाना नहीं जाता. राम चरित मानस का भी नहीं.

गुरुदेव रबिन्द्र नाथ टैगोर कहते है की मैं श्रेष्ठ का चुनाव नहीं कर सकता, श्रेष्ठ मुझे चुन सकता है.

राम अयोध्या में लोगो के घर नहीं गए, बच्चो से बात नहीं की. उन्होंने ऐसा मिथिला में किया, भक्ति के नाते.

राम नाम का फल समाधी है, समाधी का फल राम नाम है.

जब आप उद्विग्न होते है तो राम गुण गान करे, सतसंग करे या अकेले बैठकर हरि स्मरण करे.

शिव तत्व द्वार पर होता है और भक्ति तत्व घर में होता है पर उसका संयोग करने के लिए नारद जैसा सदगुरु चाहिए.

 

*********day 7***********

 

यदि सिद्धि में कोई अर्थ नहीं है तो सिद्धि की बात हनुमान चालीसा में कैसे?

भारद्वाज जी के आश्रम में भी सिद्धि की बात है.

सिद्धि का अर्थ है की भक्ति रस में सिद्ध हो जाए.

हमको अन्य सिद्धि मिल भी जाए तो भी हम पचा नहीं पाएंगे.

सिद्धि का अर्थ है हरिनाम लेते लेते भगवान का अस्तित्व प्रतीत हो.

भक्ति करते करते ताप का दूर होना ही संतत्व है.

मुझे सिद्धि नहीं चाहिए.

इश्वर कुछ ज्यादा दे तो मना करने की साधू में क्षमता होनी चाहिए.

हमें देशी गाय रखने से लाभ होगा हाथी मिल भी जाये तो क्या करना है.

रति याने हरिपद रति. प्रतिक्षण वर्धमान होने वाला, क्षण क्षण बढ़ने वाला भाव.

महादेव आपने काम को जलाया हमें रति दो.

भजन का कोई फल नहीं होता, जहा फल है वहा फस गए.

तप का फल है सर्जन, विलय.

योग का फल है समाधी.

गुरु से स्थूल सम्बन्ध नहीं, चैतसिक सम्बन्ध रखो.

गुरु कर्म नहीं देखता, करुणा देखता है.

महादेव के आगे गर्व नहीं चलता, स्वभाव चलता है.

भक्ति में मांग जबसे आई, भक्ति क्षीण, दुर्बल होने लगी.

राम भक्ति में हमारी सिद्धि हो. हमें श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद सेवन, आत्म निवेदन में उसकी प्रतीति आये.
पाद सेवन माने वचनामृत की सेवा.  गुरु के वचन को मानना.
आम का कोई आम नहीं होता, उसका रस होता है. फल की बात न करे.
आपन तेज सवारों आपै का अर्थ है अत्त दीप भव, आप खुद ही खुद के दीप बने.
राम भजन करने वाले को कर्म चाहिए फल नहीं, फल परेशान करेगा.
धर्म मुस्कुराये. साधना पद्धति मुस्कुराती हो.
बाह्य कर्मकांड स्थूल है, प्रतीकात्मक है, लोक संग्रह के लिए है. असली साधना तो भीतर होनी चाहिए.
कृष्ण रसरूप है. उसका भक्त कहलाने वाले रूखापन, क्रोध न करे.
साधक अपने आप से करे. खुद जागे. गुरु से विचार, दीक्षा तो मिल जाएगी पर आचार तो खुद करना होगा.
खुद को रंगे बिना दुसरो को रंग नहीं सकते.
वाल्मीकि रामायण परम मंदिर है.
तुलसी रामायण प्रवाहमान गंगा है. कोई भी जा सकता है. कभीभी स्नान कर सकता है.
कही बिधि कहु जाऊ अब स्वामी यह तुलसी की चौपाई तो गाव गाव तक, जन जन तक पहुच गयी. तुलसी रामायण हर कही पहुच गया.
ब्रह्म का लक्षण है व्यापकता.

राम अवतार के चार कारण –

१. जय विजय को शाप.
जय विजय ने सनत कुमार को कैसे नहीं पहचाना? डयूटी बजाते वक्त विवेक रखना चाहिए.
२. जालंधर वृंदा का प्रकरण.
३. नारद का शाप.
४. मनु शतरूपा की तपस्या.
५. राजा प्रताप भानु का प्रकरण.

कौशल्या ज्ञान की धारा है उससे राम ब्रह्म के रूप में प्रकटे.
कैकेयी कर्म की धारा है उससे राम भरत याने विवेक के रूप में प्रकटे.
सुमित्रा उपासना की धारा है उससे राम लक्षमण अर्थात जागृती और शत्रुघ्न अर्थात मौन के रूप में प्रकटे.

ताडका यह कर्म का विध्वंस करने की धारा है वह रावण को सहायक हुई.
मंथरा ज्ञान का विरोध करने वाली धारा है. उसने भरत और राम में द्वैत देखा. वह राम को लोगो से दूर करने में सहायक हुई.
शूर्पनखा भक्ति की विरोधी है. उसने सीता को नष्ट करने की कोशिश की और रावण को सहायक हुई.

 

*********day 8**********

एक युवक ने प्रश्न किया आपने कहा था की धर्म सुख विरोधी नहीं होना चाहिए.

सुख है, सुख के कारण है, सुख का उपाय है, सुख संभव भी है.

तो क्या धर्म दुःख विरोधी होना चाहिए.

 

उत्तर है की धर्म किसीका भी विरोधी नहीं होना चाहिए.

विनोबा भावे हरदम कहते थे की लड़ाई दो धर्मो के बीच नहीं दो अधर्मो के बीच होती है.

 

विशेषण लगाने से दुसरे का विरोध होता है.

 

यहाँ दुई की सुई ना चुभती

घुले बतासा पानी में

 

यह मस्तो की सभा है, यहाँ सोच कर आना जी.

 

धर्म का प्रचार करने की आवश्यकता नहीं है. धर्म निज सम्पदा है.

 

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर.

 

हाथ में फांसा नहीं है तो क्या हुआ जुआ तो मन में चल रहा है.

 

कली खिल कर फूल बनने को एक रात लगती है.

 

कथा से हमें रूपांतरण का पता नहीं चलता.

 

दुष्ट का कर्म भी विफल नहीं होता इष्ट का कैसे होगा.

 

२०० – ३०० साल में गाँधी बहोत प्रासंगिक हो जायेंगे.

 

प्रयत्न को छोड़ देने की इच्छा बुढ़ापे के आने का संकेत है.

 

मेरी एक भी कथा विफल नहीं हुई.

 

किसी को कथा भोग के पहले, किसी को भोग के समय और किसी को भोग ने भोगने के बाद लगती है.

 

परमपिता भोले भंडारी ने कथा की स्थापना की है.

 

लकड़ी पर बहोत आवरण है. कथा के प्रवाह में पड़े रहो, सब आवरण गल जायेंगे और लकड़ी तर जाएगी. जो उसका सहारा लेगा उसे भी तार देगी.

 

मोम बत्ती अपने ही मोम से प्रकाशित होगी. बाजूवाली मोमबत्तीयो का मोम काम का नहीं. उधार लिया हुआ काम नहीं आएगा.

 

हांक भगाने के लिए भी होती है, पास बुलाने के लिए भी होती है.

 

विजय शब्द अच्छा नहीं असर अच्छा है.

 

जो कुछ हमें मिला है किसीसे मिला है, उसीसे मिला है.

 

सत्य की वाणी, सौंदर्य, ज्ञान को व्यक्ति का समझना भूलो की परंपरा पैदा करता है.

 

जैसे गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने कहा है की जब शब्द सत्य की गहराई से आते है.

 

कोई भी बड़ा व्यक्तित्व नक़ल करना नहीं सिखाता.

 

जो जहा का होता है, वही उगता है.

 

सत्य, विवेक, महत्त्व आयेगा जो उसके प्रभाव में जियेगा.

 

प्रीति का मार्ग याने भक्ति योग. राग द्वेष से परे जाना याने ज्ञान योग. नीति का मार्ग याने कर्म योग.

 

हनुमान चालीसा में जो प्रेत कहा गया है वो व्यक्ति जो सम्मान चाहता है वही है.

 

जितने द्वंद्व है भूत है.

 

साधक सुख दुःख में सम रहता है.

 

***********day 9*********

पाप करने से विवेक बुद्धि का नाश होता है. ऐसा होने से व्यक्ति बार बार पाप करने लगता है.

पुण्य करने से विवेक बढ़ता है.

प्रेम तपस्या का मार्ग है, भोग का मार्ग नहीं है.

राम ने शरयु से गंगा के तट तक रथ यात्रा की. शरीर रथ है, धर्म रथ. रथ में सबसे महत्त्वपुर्ण चक्के है. शौर्य और धैर्य इस रथ के पहिये है. सत्य और शील इसकी पताका है. परिणति सत्य में होनी चाहिए. धीरज शौर्यवाला हो कायरतावाला नहीं.

जीवन एक वन है. चौर्यासी लाख योनी का वन है.

बुद्धि याने विद्या ये नौका है. जमीन पर यात्रा सरल है. काल प्रवाह में यात्रा विद्या से ही हो सकती है.

राम ने पदयात्रा सत्ता का त्याग करने के बाद प्रेम और सत्य की प्राप्ति के लिए की.

आकाश यात्रा याने असंग यात्रा. संग याने आसक्ति.

श्रुन्गवेरपुर में प्रभु ने केवट का धन्यवाद किया, सबको गले लगाया.

भरत हनुमान से कहते है की मुझे लगता है की साक्षात् राम मिले है. तब प्रभु विमान से आ रहे थे पर हनुमान में बैठकर मिले.

पशु से मानव बनाने की विद्या है राम चरित मानस.

ग्लानी को समाप्त करना राम कार्य है.

राम सत्ता के पास नहीं गए. वशिष्ट जी ने उनके लिए सिंहासन मंगाया. जहा सत होता है वह सत्ता आती है.

मानस ७०० कथा के दौरान सात विशेष अनुभूति…
१. कृपा की विशेष अनुभूति
२. विशेष कलाओ की अनुभूति.
३. विशिष्ट कथा शैली.
४. काल की अनुभूति.
५. कीर्तन की अनुभूति.
६. शरीर होते हुए कैवल्य की अनुभूति.
७. कृत कृत्य भाव की अनुभूति.

जहा तक कदम चले आ गए है

अँधेरे हमें रास आ गए है

 

Manas Ravan 10 – A discourse listened from Morari Bapu and to the extent I understood..

The Vyaspeeth is a sadguru in itself. The person occupying the vyaspeeth is not.

Ramcharitmanas guides the person who speaks and to those who listen. The speaker is not giving any guidance.

Yagyavalkya should be considered as a karmpeeth – platform of action.

We should learn from Ravana, we should take inspiration from Ravana.

There is no need to be have much curiosity about Ahi Ravan and Mahi Ravan rather we should know the Sahi Ravan.

Ravan is sitting in the lanka of infatuation and he is there in all ripples rising in our mind.

Ravan is not the villain, he is the counter hero.

Ram is supreme comfort, Ravana is efforts full of labor.

Ravana selected the path of attaining supreme comfort through efforts full of labor.

Ravana labored a lot with his 20 hands and didn’t give anything to others.

Those who readily offer others whatever they can, don’t have any grievance against life.

When a person becomes Buddha his lineage has no significance for him.

We can reach light when we move away from darkness. So we can’t reach Rama without understanding Ravana.

Ravana is very close to us, Rama is far away at a great height.

Ramayana is like a power-house, like a mother.

When we weep remembering God, we are doing worship.

Day 2

An event happens due to…

there comes the right time

needed action is done

mental setup of a person

the state of person during that moment – tamasik, rajasik, satavik.

Remembering God causes purification of the intellect.

A devotee should not be so wise that he stops remembering God.

Ravana has habit of doing what Vishnu does. He want to do what others have done, even though he doesn’t have any worth. Whenever we behave like this and start imitating others we should know that Ravana has taken charge of our mind. Ravana is nothing but infatuation that we have in our mind.

Ravana tried to humble King Bali as the latter was humbled by Vishnu. Those who are devotees of God can’t be humbled by Ravana. So when confrontation took place Bali defeated  Ravana very easily.

Sahasrarjuna has thousand hands and Ravana twenty. He tried to overpower Sahasrarjuna. Again this is common phenomenon. We out of jealousy try to overpower those who are more powerful and get defeated. So when we act out of jealousy we are under the influence of Ravana. Sahasrarjun on the advice of Sage Pulastya released Ravana. So those who remain under the influence of Sadguru defeat Ravana easily and also don’t bother to show it off to the world unnecessarily.

Baali defeated Ravana and held him in his arms for 6 months. Here Bali symbolizes ego. Those who are egoistic, they always want to show their might to the world and they suffer on this account. So Bali carried burden of Ravana unnecessarily for 6 months.

Ved say that your hands are God.

Eyes mean enlightenment, the right thought, attaining the objective.

Surdas didn’t see the world by his eyes but he saw that creator of the world.

Sadguru means a person with whom we don’t have any distance, we are one with him.

When we start acknowledging that we have ego we begin our journey to God.

Ravana rejected his profile presented by Angad and talked about his accomplishments.

Shiva is the ego of the universe, head of Ravana represents his ego. He offered his ego to the ego of the universe and got it back.

So here Ravana teaches us that we should not reveal only dark side of a person while introducing him but we should reveal his bright side also.

The certificate that others give us don’t do any good to us and don’t work for us.

The brother of infatuation (Ravana) is ego (Kumbhakarna). The son of infatuation is lust (Meghnaad).

Please note that Kumbhakarna sleeps for 6 months and wakes up only for one day. He does terrific damage to all the three worlds in one day and again goes back to sleep. Similarly we think that we are free from ego, but our ego is sleeping. It rises after a long gap and for a while and does terrific damage in few moments. Ego ends when it is subdued by God. So without God there is no end to ego.

On the other hand lust doesn’t sleep a lot and remains awake though it doesn’t remain awake continuously.

One can gain knowledge through…

study, experience, power of discrimination, purifying one’s mind, taking shelter at the feet of preceptor, good faith.

Remembering God causes purification of mind.

Day 3

Let us think about the cause behind Ravana’s birth.

Rama is causeless but others are not. If we discuss we may attain the truth. If we see the cause given in Ram Charit Manas, we know that the basis of Ravana’s birth is Vishnu’s abode, Vaikuntha.

If there is no Vishnu’s abode, there can’t be Jaya and Vijaya, there can’t be any instance of declining the permission, there can’t be any curse leading to Ravana’s birth. So Ravana’s birth is ultimately rooted in Vishnu’s abode.

Those who are sitting at great heights always bear risk of a great fall. They may commit a slight mistake and fall down.

Ravana is a person and Ravana is also a tendency of mind.

Kya rog laga baithe hai, Dil humko bhula baitha hia, Hum Dil ko bhula Baithe hai.

There are four stages through which a devotee sitting in a katha passes.

He adores God at the start of Katha, this is satya yug.

The very Katha is Treta Yug.

The puja, archan done during the Katha is Dwapar Yug.

Then Katha ends and the devotee enters the Kali Yug. Here he is protected as he remembers God.

The fits of lust and anger don’t last long. But greed (lobha) is everlasting.

If someone scolds unnecessarily it should be assumed that Shishupal has taken his charge.

When ego rises it affects lower limbs (style of walking), pelvic region (loses balance) and head.

His eyes, ears and mouth seek gratification of ego.

Kubhakarni Vrutti (tendency of mind) is to get much without any assimilation. Kumbhakarna devours monkeys and monkeys come out through his nose and ears.

The devotee of God is always contented. Kevat refuses gift offered by Rama for ferrying him across Ganga….

Naath Aaj Mai Kah Na Pawa | Mite Dosh Dukh Darun Dawa ||

Don’t go after ownership and possession, enjoy the existence. No vulgar interpretation please.

Mera Dil Na Khila Sari Bagiya Khili To Kya Hai

Those who carry taps with them can’t get any water, similarly the real bliss comes from the blessings of the true preceptor. One has to pay for one’s deeds but the sufferings are forgotten by the grace of the true preceptor.

To ask for something is not good.

The exceptions are – taking donation, gift, fees, prasad, recognition (if one commands it and is comfortable with it), alms.

Infatuation makes one lose the sense of time, location and worth.

 

Day 4

We can quench our thirst by approaching river of self realization at different places on it’s banks.

If  we approach Ramcharitmanas through God Shankar we are following the path of knowledge.
Mahadev has three eyes. Knowledge, Detachment and Yoga.
He has a very detached and broad vision.

The highest impact occurs on listening. Reading is not a method of devotion, listening is.
The enlightened speaker removes illusion from the minds of people. People can’t be free from illusion unless they awake.

Please don’t indulge in calling names to the speakers, you won’t gain anything.
A mind that gets into the habit of ill reasoning loses all it’s creative powers.
If there is no ill reasoning there will arise love for the feet of the benefactor.
The worst improbable events won’t take place if you are protected by the benefactor.

The other speaker Kakbhushundi has wings. It is not so that he doesn’t have eyes. Rather he has an eye of advaita. Similarly it is not so that Mahadev doesn’t have wings, you should see everything in the right perspective.

A speaker with wings means one who doesn’t get imprisoned in the cage of prestige, appreciation, title and money.
You can’t catch a crow, a crow is always on move, doesn’t take any fixed path.

Rama has taken birth in the lineage of the Sun (dispels darkness), Ravana in the lineage of the Monsters (becomes active at night)
Rama is always providing comfort, Ravana always taking efforts full of labor.
Rama is always for cosmic harmony, Ravana for personal superiority.
Both Rama and Ravana are disciples of Mahadev. Rama’s skin color in the color of Mahadev’s throat while Ravana’s skin color is the color of Mahadev’s body.
Ravana is a brahmin by lineage and his aptitude to study the scriptures. He became a brahma rakshasa by his deeds. He was a warrior. He was not a trader but he weighed Mount Kailash by his hands.

Rama is for bridging the gaps Ravana distances away his own people and creates gaps.
Rama is a great donor and he gives away. Ravana is a poacher and robs away.

Both are devotees of Mahadev. There existence is to be seen in the context of relativity.

Manthara is the Ravan in Ayodhya.
Ravana knows all the arts of a politician. 1. saam : treating others with equality. 2. daam :  offering price for others’ loyalty. 3. danda : levying penalty 4. bheda : divide and rule
Manthara can’t treat others with equality as she is a hunched back person. She doesn’t have any resources to buy loyalties. She doesn’t have any power to levy penalty. She has a malicious mind and she can create cracks in the mindset of others.
Manthara can’t remain in the company of Kaushalya (she symbolizes knowledge) and Sumitra (she symbolizes devotion / adoration). Manthara can only remain in the company of Kayikayi who symbolizes action (karma).

Gurudev Rabindranath Tagore likes most the incarnation of Vishnu as Buddha. All other incarnations have descended from divinity to humanity. Buddha has ascended from humanity to divinity.

There can’t be any donation of food. It is the duty of well fed people to see that the have-nots are provided with food. A mother is not donating any food when she breast feeds her baby.

A kerchief gets dirty after cleaning hands, Raam-Naam doesn’t get dirty after wiping impurities, it is a pearl.

If we remember that we are human beings we can live happily. If we remember that we are abodes of Mahadev we can have supreme happiness.

Those who are confused are bound to perish.

We should act with dexterity and not with miserliness.

We should do good with good faith and not to compete with others.
We ‘should do’ good understanding it well that it will still be done if we won’t do it.
We should not keep an eye on the fruits of action but we should enjoy performing the action.
We should do good to expand our scope of identity, to sacrifice our ego and never to humiliate others.
If we are not attentive we are bound to be hit by lust and anger.

Day 5

Ravana has many marks of God. But Ravana is not God.

Ravana is death, Rama is Life.

Valmiki says that wherever these 14 are Rama is.

Angad says that wherever these 14 are Ravana is.

Death is a mark of God.

Gorakhnath asks Yogi to die, he doesn’t ask a person engaged in sensual pleasures to die.

An orator was asked to speak to a gathering of audience. The orator said that he will speak if the audience undertakes to do what he says. The audience said that are ready. Then he asked the audience if they are really ready. The audience thought and said that they are ready to do anything but they should not be asked to give money. The orator said OK. He will not ask for money but are they ready to give what he will ask for. The audience thought again and said OK they will do what he asks but he should not ask for their time. He said OK. He will not ask for money or time but are they willing to do what he asks for. Again the audience thought for a while and said OK they should be asked to do the thing which they are capable of doing. He said OK he will ask for something which they are capable of doing. The audience said OK, tell us what we should do. The orator said die. There is no monetary cost involved in dying, there is no question of giving any time and everyone has the capability to die.

Death is the prerequisite to reach God.

Lord Krishna says, He is Death and He is Amrit.

A mirror is an excuse to see oneself.

Saki Sharab Laa Kyo Ki Tabiyat Udaas Hai
Muttarim Rabab Laa Kyo Ki Tabiyat Udaas Hai

If the existence would have been a miser, we would not have existed.

He who carries weapons is a coward.

Vyavasay doesn’t mean business in scriptures, it means determination.

Not  being an adamant but having strong determination, there is no need of any target.

Day 6

The truth is like an ice-cream. There will be some some transformation in the process of transfer.

Hanuman didn’t do any worship by allocating a specific time for that activity. He was always doing Raam Kaam and chanting Raam Naam.

Bhagwan Shankaracharya says that we are at our best when we are at our ease. The states of dhyan and dharna are inferior to sahajawastha.

We are not doing any worship when we are making comparison with others, we should see how far we have progressed.

Your soul is Mahadev. Your intellect is Parvati. Your home is temple. Your walking and moving is performing parikrama. Your true and loving words are chanting of stotras. This is how Shankaracharya has defined the sahajawastha, the state of being at ease without breaks.

Those who do special worships are superior and those who are in the state of ease are inferior is not true.

Instead of focusing your mind at the tip of your nose you should look at the whole universe with kindness.

Raam Kaam means working for Rama. It means doing the following….
bridge the gaps in the society
search Sita
arrange for the medical treatment to some needy person

Kabir has also said ‘Sadho Sahaj Samadhi Bhali’
The best state of meditation is to remain in the state of one’s ease.

Two eyes means one vision, so twenty eyes means 10 visions.

Ravana has 10 visions.
The vision of knowledge – Gyan Drishti
The vision of fault finding – Dosh Drishti

The vision that divides – Bheda Drishti
The infinite vision – Apar Drishti
The vision of emotion – Bhaav Drishti
…………………..

There can’t be any good by kidnapping, there can be good by offering oneself to truth, compassion and love.

It is very obvious that Ravana has a vision that divides. He was born to Diti, diti means division.

Why there are temples of Rama? It is because he didn’t have any jealousy towards his enemy. He asked Lakshamana to gain knowledge from Ravana when the latter was lying on his death bed. The world won’t find any fault if Ravana is ended but the world will find fault if the knowledge that Ravana had also ends.

One should never go to preceptors with empty hands, one should have something to offer as sacrifice in the fire of knowledge. Hanuman gave some grass to Lakshamana when he approached Ravana for acquiring knowledge. This is an indication to the underlying principle.

 

day 7

These are all excuses to see oneself.

Gyan Drishti – Ravana has the vision of knowledge but he could not hold that with continuity as all of us don’t have vision of knowledge without breaks.

Dosh Drishti – Ravana has the vision focused on the shortcomings of others. He could locate fault in Rama who is faultless.

Bheda Drishti – The vision to deceive others. Ravana was good at deceiving others like he deceived Sita by his false appearance.

Those with Gyan Drishti should not see any Bheda. But Gyan Drishti can’t be maintained with continuity.

Gita and Upanishads say that God is there in all beings, He is there in the same form in all beings, He is there in all beings at all times.

Why there is darkness inspite of light? The reason is Maya – The Deluding Potency of God.

What is Raam Kaam, the work of Rama? Everything literally everything.
Do a job and do it as if it is a work of Rama.
If your father tells you to do something do that thing as if you are doing it for Rama.
Get married and think that you are doing work of Rama.
We do a faulty thinking. We think that whatever good is happening we are doing and whatever bad is happening others are responsible.
If we disregard the ultimate (param) we stop doing the work of Rama.
Every work is the work of Rama, when we work to serve our ego the meditation breaks.
If we take a loan from bank, it is Rama’s work, if we pay the installments it is Rama’s work. If we make a default in repaying loan and if we go to jail, it is our work.
As per the agreement between Rama and Sugreeva, search of Sita was Sugreeva’s work, he should have done some search on his own instead of asking his deputies to do all search.
Life is meditation.

When Buddha came to the house of his wife asking for alms, she asked him a question. She said whether it was not possible to discover the ultimate element at home and whether it is necessary to go to woods. Buddha said it is possible to discover the ultimate element at home but he came to know this after relinquishing home.

The central theme of Ramcharitmanas is Sab (All), Gita Sam (Equanimity), Upanishad Satya (Truth)

We have a mental disposition to see sorrow in joy.

We deserve happiness, We are children of Amrut, Our true form is happiness.
You can’t have any claim over intellect of others, you should live your own way of life.

There is no point in cutting oneself for sharpening the blade of intellect.

The biggest happiness is being a human.

Our soul is the touch stone (Paras mani), we are iron, there is a layer of Maya in between. If there is no layer we are gold.

There is pearl at the bottom of the pond. The pearl can be seen if there is no layer floating at the top, there are no ripples in the pond, there is no dirt in the pond.

See what happens due to the vision of greed (lobh drishti)-
Pratapbhanu is a greedy hunter. He has too high ambitions. He has forgotten God. He is having thirst. He was deluded by a bogus sage. He who is overcome by his greed will only meet a bogus sage. He who is full of lust and cravings loses his power of discrimination. A greedy person can never enjoy. He will accumulate. A lustful person at least enjoys. A greedy person will eat rotten mango, he will wait for more ripening. Similarly he will damage the seed while eating raw mango. He wants to eat more of the raw mango but renders the seed useless. A greedy person drops a bottle of tincture iodine on ground. The bottle breaks and the lotion spreads on ground. Now he cuts his fingers with a razor and applies the lotion on wounds.

Bhog Drishti – The vision restricted to sensual pleasures.

Kripa Drishti – Being firmly benign like that a mother.

Udar Drishti – Ravana imparted knowledge to Lakshamana (brother of his enemy) in his last moments.

Param Hit Drishti – He led to the salvation of all demons.

Day 8

 

There is a concept of Virat Kosh (a gigantic form) in scriptures.

The directions are considered as ears of the gigantic form.

The truth of the western culture and the eastern culture should be heard.

Truth coming from all directions should be heard.

Bhala Bura Sabka Sun Lije

Kar Gujran Garibi Me

Man Lago Phakiri Me

He is great who listens to all. He is a saint who keeps all that which is good for him in his heart.

The eldest person in home should listen to everybody. A good preceptor should listen to his favorite disciple and also to the disciple who has joined him recently. He should also listen to his admirers and to those who speak against him.

A person who has taken the path of self-realization should not listen to good words spoken to him but he should listen to all those who criticize him. If the criticism is valid he should mend his ways and if the criticism is not valid he should ignore.

 

There is no point in considering oneself great without understanding the things.  Ravana has many things that should make one proud. We are the Ravanas who feel proud without having anything to boast of.

 

When you are pitted against others, control your eyes, ears and mouth.

Listen to the story of Rama and also to the plight of others.

Please don’t stick to your own point, you should learn from others if they have better ways of doing things.

Don’t listen to something devoid of any meaning. Listen to something meaningful.

The truth is one but it manifests itself in different ways.

 

The three brothers Ravana, Kumbhakarna and Vibheeshana did the same penance at the same place and they were blessed by the same Gods.

Ravana has done penance for seeking blessings of God Shiva. God Shiva was pleased and he appeared. God Brahma also appeared. God Brahma is the God that presides over intellect, discretion and thoughts. Ravana asked for the boon of immortality and the only way he could die would be at the hands of human beings, monkeys and bears. Look at the irony, he sought immortality and confirmed the manner of his death. He should not have talked about death while asking for a boon. He should have talked about life rather.

 

However smart we try to be, we can’t evade death. Duryodhan felt ashamed to appear completely naked before his mother. But he had no shame in stripping Draupadi of her robes in the royal court. It is good to remove layers on one’s soul but it is a hideous thing to strip others. Gandhari on the dint of undivided loyalty to her husband, a great virtue indeed, acquired a great power in her eyes. She should not have misused this power. She should not have thought of fortifying wrong deeds of her son on the basis of her power. She did exactly opposite. She tried to impart vajra like strength to Duryodhana. She asked him to come fully naked so that when she opens her eyes she could see all his body and impart infallible strength to it. Duryodhana due to shame  covered his vital organ with a bark of tree. See the very power instead of making Duryodhana immortal confirmed the area which will lead to his death.

 

We should do penance for filling each and every moment with happiness.

Day 9

There are 14 sections of Ramayana. There are seven Kands and in each Kand we have two parts.

Bal Kanda has two parts. The first part deals with introduction of the book, about the heroes and counter heroes. The second part contains the wedding ceremony of Shiva and Parvati. It also contains the wedding ceremony of Rama and Sita. The union of Brahm and Shakti.

There is a possibility of misapplication if power is acquired continuously. Therefore devotion is also necessary and one should not lose sight of devotion.

One should not aim at Kingdom, one should aim at Ram. One should not aim at occupying a chair but one should aim at being at a feet of a competent person and occupy the chair only as a trustee. One should not aim at power but at truthfulness.

The first part of Ayodhya Kand is centred on petty selfishness – Kaikayi, Manthara.

Even great people experience a downfall when they get into a company of bad. Kaikayi was such a great lady that she gave birth to a noble person like Bharata. But see what happened to her due to  being accompanied by Manthara. She yielded to passions and lost her husband for enthroning her son.

The latter part of Ayodhya Kand is focused on broadening one’s consciousness (parmartha). Rama met people living in woods, sages performing penance in woods. He also met Bharata.

Love is the greatest method to broaden one’s consciousness. A person who loves gets love in return. A person who loves doesn’t aim at any other reward. Rama likes love and only love. Ram Hi Keval Prem Piyara.

The first part of Aranya Kand deals with the sports of Rama as a human being. The latter part deals with sweet discussions on the path of devotion.

The first part of Kishkindha Kand deals with the life sketches of Vali and Sugreeva. The second part deals with search of Sita. Sita symbolizes peace, devotion, the deluding potency of God.

The first part which comprises of 75% of Sundar Kand deals with the  life style of Hanuman and the remaining part with the life style of Vibheeshana.

The first part of Lanka Kand deals with construction of a bridge and efforts to arrive at a truce. In the war of Ramayana Rama and Ravana both won. In the war of Mahabharta both the sides lost. Kauravas lost seemingly but Pandavas couldn’t attain the higher levels of existence. In Ramayana Ravana was able to merge his identity with the face of Rama (which is the highest level of existence). So Rama bridged the gap with Ravana and granted him salvation.
The first part of Uttar Kand deals with the kingdom of Rama  and the latter part with the internal kingdom, the kingdom of soul.
The rule, the power and the kingdom these are physical subjects with which the former part deals. The latter part deals with spirituality.

Hari is infinite and so are his stories.

Ved say that your hands are your God. But his twenty hands didn’t do any good to Ravana. Eyes have a lot of significance but eyes did no good to him. Ravana didn’t have any nose as such because a person doing ignoble application of his wealth loses his nose. He didn’t use his tongue to chant Raam Naam he said everything rubbish.

Ravana did good to himself by listening. He listened to 10 persons.

In this world eyes are considered as best source of evidence. In the world of devotion listening is the most significant source. Ravana listened to….
Shurpanakha (sister). One should listen to someone who doesn’t have nose and ears.
Marich (subordinate and relative). One should listen to someone who has experience. Marich was injured by Rama’s arrow.
Janaki. One should listen to one’s mother.
Hanuman. One should listen to one’s preceptor.
Vibheeshana. One should listen to one’s brother.
Mandodari. One should listen to one’s wife.
Malwant. One should listen to one’s minister.
Prahasta. One should listen to one’s son.
Angada. One should listen to a person who comes to convey a message
Kumbhakarna. One should listen to a person who sleeps. He may be telling something that merits.

Reading is a tendency of mind, listening is devotion.
It is a good thing to love reading books.
But is also necessary to listen the song a flowing river sings.
The speaker speaks and takes the responsibility for his words. The listener listens and should take the responsibility for what he has listened.
One who has no time to look at the boundless sky, how he will cause his development.
One should also listen to the vibrations of internal sky.
One who sleeps in open becomes kind.

Ravana got back his head each time it was cut. Infatuation can’t be removed at the tip, it comes back. It has to be removed at source. The infatuation can be cut only at the muladhar.

Buddha says that you should be your own source of light.

 

adapted contents of http://www.iiramii.net/katha693_manas_aushadh.html

राम चरित मानस का सूत्रात्मक सिद्धांत – जिस कार्य के प्रारम्भ  में प्रसन्नता हो वह कार्य परिपूर्ण होता है.

 

परमात्मा जिसे मुहोब्बत करता है ऐसे जागृत महापुरुष की करूणा से निकली हुई बोली से हम प्रसन्न रहते है – ऐसा जहा तक मेरा व्यक्तिगत मानना है.

 

गुरु एक ऐसा तत्त्व है की जिस तत्त्व की छाया में हम सब जीते है. गुरु के लक्षण को सिद्ध कर सके ऐसे जागृत महापुरुष के संग में और उनके मार्ग दर्शन में जीना चाहिए.

 

पांच देवो की पूजा सूत्रों के रूप में हम थोडा हो सके तो आत्मसात करे –

१. उजाले में जीना वो सूर्य पूजा.

२. व्यवहार में विवेक रखना वो गणेश पूजा.

३. ह्रदय की व्यापकता से दुनिया में जीना वो विष्णु पूजा

४. विशेषण मुक्त श्रद्धा, त्रिगुनातित  श्रद्धा वो दुर्गा पूजा

५. दुसरो का शुभ कल्याण हो ऐसे भाव से जीना वो शंकर पूजा.

 

तीन वाणी

१. श्लोक वाणी – यह ज्यादातर भविष्य काल से सम्बंधित है.

२. लोक वाणी – यह वर्तमान काल के साथ निरंतर संबंधित रहती है.

३.शोक वाणी – यह भुत काल के साथ संबंधित है.

 

मानस रूपी औषधि से मैंने मेरी यात्रा में कई लोगो के काम क्रोध और लोभ को क्रमशा कम  होते हुए देखा है.

 

मेरी दृष्टी में राम चरित मानस स्वयं एक औषधि है, जितना हो सके मानसिक रोगों को मिटने आया हु.

 

मानस के सभी कांड  में लागु होने वाले रोग

१. बाल कांड – संशय

मेरी निजी प्रार्थना है की संशय पैदा करे ऐसे लोगो का संग मत करो, अपना भरोसा बढा दे ऐसे लोगो का संग करो.

 

२. अयोध्या कांड – काम

काम रूपी भुजंग जिसको डस जाता है उसको संसार विषय रूपी भोग मीठे लगते है.

 

३. अरण्य कांड – चोरी

किसीका अपहरण करना सिर्फ गुनाह ही नहीं मानसिक रोग भी है.

 

४. किष्किन्धा कांड – अभिमान

 

५. सुन्दर कांड  – कुरूपता, विचारो और सिद्धांतो की

 

६.  लंका कांड – तमस , इसमें तमो गुण का प्राबल्य है.

 

७. उत्तर कांड – इस कांड का रोग क्रोध है.

 

और इन सभी रोगों का औषध मानस है.

 

हरी नाम में प्रीति और प्रतीति दोनों मिल जाये तो हमारा आनंद बढा देती है.

 

हरी नाम को भी औषध माना गया है. ये हमारा रक्षक भी है, इसलिए नाम का आश्रय बहुत करना.

 

काम, क्रोध और लोभ के कारण  आती मूर्छा और उसका इलाज.

१. आर्थिक मूर्छा यह लोभ है. जिसे लोभ हो उसे आर्थिक विवेक रहता ही नहीं. उसका निवारण समर्पण याने दान करने से होगा.

२. मानसिक मूर्छा माने काम. उसका इलाज है हरिनाम का ज्यादा स्मरण.

३. बौद्धिक मूर्छा याने क्रोध. बुद्धि के सहारे जीने वाला क्रोधित हो जाता है. इसका निवारण है किसी बोधमयी महापुरुष के साथ जीना.

 

प्रसन्नता व्यक्ति को तीन वस्तु से भर देती है…

१. असंगता – आदमी जितना असंग रहेगा उतना प्रसन्ना रहेगा. संग आदमी को बीमार बना देता है. कमल के तरह जल में रहकर असंगता से जीना. एक निश्चित डिस्टन्स बनाये रखना, कोमलता से कठोरता से नहीं.

२. मन की तेजस्विता – प्रसन्नता आदमी को कभी मलान नहीं होने देती. वह मन से तेजस्वी बनता है.

३. करुणता – आदमी अन्दर से बरसता हो बादल की तरह करुणा से.

 

मेरी एक प्रार्थना है एक बार करके देखो. तुम्हारा सब कुछ पद प्रतिष्ठा को एक बार छोड़कर भाव से हरी नाम लो. प्रसन्नता तुम्हारे पैर चूमेगी.

कथा में मूल तो वही रहेगा पर फूल समयानुकूल नया खिलेगा. इसलिए लोग कथा में प्रसन्न रहते है.

 

युवा भाई बहनों से मेरा कर बद्ध निवेदन है की कुछ भी हो आप प्रसन्न रहने का संकल्प करना.

 

अध्यात्मिक जगत में मानसिक रोग से हम निवृत्त हो गए है उसका प्रमाण यह है की हम प्रसन्न रहने लगेंगे. रोग निकल जाते है तो प्रसन्नता आती है,  प्रसन्नता रहे तो रोग आये ही नहीं. रोगी का एक लक्षण है अप्रसन्नता.

 

किसीके मानसिक रोग के निवारण के लिए..

१. पुरुषार्थ होना चाहिए

२. प्रारब्ध होना चाहिए

३. किसीकी करुणा भी होनी चाहिए.

हमारे शारीर में वात पित्त कफ इन तीनो की सम्यक मात्रा होनी चाहिए. उसका अतिरेक नहीं होना चाहिए. उसकी विषमता व्यक्ति को रोगी बना देती है.

हमारे मन में जो वात है वो काम है.  जो पित्त है वो क्रोध है और जो कफ है वो लोभ है. इन सबकी सम्यकता होनी चाहिए, इनकी विषमता रोग पैदा करती है.

मेरा सब कुछ राम चरित मानस है, उसी के बल पर प्रसन्नता  से चलता हु.

आदमी जगत में कितना भी जागृत क्यों न हो लेकिन, काम क्रोध और लोभ उसको मूर्छित कर सकते है. इस सत्य को अनदेखा न किया जाये. जीवन में कभी भी मुश्किलें आ सकती है लेकिन हरी नाम का बल हमारा पतन नहीं होने देता. आखिरी समय में वो हमें मदद करता है.

बाप रुद्राष्टक जैसी कोई औषधि नहीं है रोज सुबह और शाम उसी को पियो. उसे जीवन का एक अंग बनाओ.

हर रोज भोजन हमारा स्वभाव है वैसे ही भजन भी हमारा स्वभाव बनाना चाहिए. हरी नाम की आवृत्ति नितांत आवश्यक है.
राम कथा को फूल से भी कोमल और वज्र से भी कठोर की उपमा दी गयी है. रामकथा हमें चन्द्र किरण समान शीतलता प्रदान करती है और वज्र समान हमारे महा मोह को समाप्त करती है.

काम, क्रोध और लोभ ये तीनो जीवन में सम्यक मात्रा में जरुरी है. लेकिन उसका अतिरेक न हो समत्व पैदा हो तो निरोगिता है.

शिष्य कहते है उसे जो गुरु कहे की पहाड़ के शिखर से गिर जाओ तो गिर जाये. लेकिन मेरी समझ में गुरु वह है जो अधिकारी शिष्य के कहने पर शिखर से गिर जाये.

ज्ञानी याने जिनका देहाभिमान  छुट गया है उनके लक्षण.
१. उनका जीवन निरंतर प्रकाशमान रहता है.
२. आनंद – वो आठो पहर आनंद में रहते है.
३. उनके जीवन में हरदम उत्साह बना रहता है.
४. उनमे चैतन्य होता है, जड़ता और मूढ़ता नहीं होती.

दोष इतने ख़राब नहीं होते है जितना हरी का विस्मरण होता है.

युवा लोगो ने गीता के उपदेश के अनुसार ये काम करने चाहिए
१. कोई भी काम करे तो विधि पुर्वक करे.
२. अन्न दान करे.
३. दक्षिणा दे.
४. जो भी कार्य करे श्रद्धा से करे देखा देखी न करे.

मानस में मूर्छा का उल्लेख.
१. लक्ष्मण की मूर्छा संजीवनी से गयी.
२. हनुमान की मूर्छा साधू प्रभाव और हरी नाम से गयी.
३. दशरथ की मूर्छा सुमंत्र के आने से गयी, जब सुमति आई, सत्य मालूम हुआ.

राम चरित मानस – राम की लीला का अवतार.
अयोध्या – राम के धाम का अवतार.
करुणा मूर्ति भरत – रूप का अवतार
हनुमान – नाम का अवतार.

तुम्हारी आत्मा ही परमात्मा है, वह तुम्हे आशीर्वाद दे ऐसा कुछ करो.
प्रेम, भक्ति में साधक के पास दो वस्तु होती है – प्रभु का आश्रय और हरी नाम के अश्रु.

मानस में दी गयी बीमारिया..
१. शोक – जो घटनाये घट चुकी है उसे लेकर दुखी होना.
२. हर्ष – हर्ष के साथ शोक सापेक्ष है. छोटी जीत को लेकर जो हर्षित हो जायेगा वह छोटी हार से दुखी हो जायेगा.
३. भय – किसी भी परिस्थिति में भयभीत रहना, रोग नहीं तो क्या है.
४. प्रीति यानि प्रेम को भी रोग माना गया है.
५. वियोग को भी रोग कहा गया है.

मै कथा का दान सुपात्र के पात्र में ही डालता हु. हम सबकी जो मानसिक बीमारी है उसका इलाज केवल राम चरित मानस है.

दूसरों की तरक्की देखकर जो हमारे दिल में जलन पैदा होती है वो असाध्य है. और सत्संग कथा के माध्यम से दूसरों की तरक्की देखकर हमारी जलन कम होती दिखाई दे तो समझना की वह रोग साध्य होने जा रहा है.

प्रेम रूपी कुरोग का कोई औषध नहीं है. मानस में यह कुरोग भरत को हुआ है. स्वयं भरत को भी लगता था की मेरे इस कुरोग का कोई इलाज नहीं है. शायद उसका इलाज हो राम दर्शन. इस रोग का इलाज पद नहीं किसीकी पादुका है. पद और प्रतिष्ठा कभीभी मानसिक रोग का इलाज नहीं बन सकती.
ये सब औषधि तो है लेकिन कायम इलाज नहीं है. ये केवल हमें थोड़ी मदद करते है. परमात्मा का नाम वो भी अनुपान रूपी श्रद्धा के साथ वही आखरी इलाज बन सकता है.
१. नियम के साथ जीवन जीना एक औषधि है.
२. धर्म की स्मृति से आप अधर्म को भूल जाते है. यह एक औषधि है.
३. आचार अच्छी बात है लेकिन उसका अहंकार नहीं होना चाहिए और अतिरेक भी नहीं होना चाहिए.
४. तपस्या भी एक औषधि है, उसका भी अतिरेक नहीं होना चाहिए.
५. ज्ञान में मान आने की सम्भावना है, इससे घमंड पैदा हो सकता है.
६. यज्ञ
७. जप – कोई मंत्र या नाम का जप एक औषधि बन सकता है.
८. दान भी एक औषधि है लेकिन इसका अहंकार नहीं होना चाहिए.

विशुद्ध श्रद्धा की भी अपनी एक घटना होती है, लेकिन  उसको  प्रयोगशाला   में   कस्नली   में लेकर  सिद्ध  नहीं  किया  जा  सकता . जिसको  पुरे  भरोसे  के  साथ  श्रद्धा हो वही  समझ  सकता है. श्रद्धा जगत  की भी एक रहस्यमयी  दुनिया  है.

 

कोई  अछूता  न  रह  सकता महादेव  के बिना. महादेव महादेव हैं. यदि विश्राम पाना हो तो शंकर को भजो. किसी न किसी रूप में आपकी भीतरी  धारा शंकर को भजेगी ही भजेगी.

 

जिस पर तुम्हारी पूरी निष्ठा  हो और उसका पावर हो तो उसका एक बोल तुम्हारी बीमारी निकाल देता है.

 

द्वेष से बिलग होना इससे अच्छा है जब प्रेम है तब बिलग हो जाना.

दुनिया में जो भी चीज सरलता से मिलती है उसके समान मूल्यवान कुछ भी नहीं है.

अपना मन जितना राग द्वेष मुक्त होगा उतना हम निरोगी होंगे. राग द्वेष मन की सुमनता को नष्ट कर देते है.
कथा कहते कहते और सुनते सुनते जितना हम राग द्वेष से मुक्त होते जायेंगे तो मन के रोग मिट जायेंगे. हम क्यों उसके पीछे अपने चैतसिक प्रदेश को रोगी करते है.

 

बीमारी की कुरूपता ही निरोगिता का श्री गणेश है. दुर्गुणों का स्वीकार सद्गुणों की शुभ शुरुवात है. जो स्वीकार करता है वो आगे बढ़ता है.

 

बापू की समझ में …

साधना माने कर्म योग जिसमे साधक कुछ करने से पाता है.

उपासना माने ज्ञान योग जिसमे साधक भीतर से किसी पहुचे हुए सदगुरु के पास बैठ जाता है.

आराधना माने भक्ति योग.

 

दुसरो को देखने के लिए दृष्टि चाहिए, खुद को देखने के लिए दर्पण चाहिए लेकिन परमात्मा को देखने के लिए दिव्यता चाहिए.
तुलसी कहते है की वे राम कथा कह रहे है..
१. खुद के सुख के लिए

२. वाणी की पवित्रता के लिए

३. मेरे मन को बोध हो और मेरी निजता में स्थिर रहु  इस लिए.

 

अध्यात्म जगत के बैद का नाम है सदगुरु.

 

पांच चीज जिसका संयोग हो जाये तो मंगल और कुयोग हो जाये तो अमंगल होता है.

१. गृह – जो अच्छे स्थान में आये तो शुभ फल देता है और अच्छे स्थान में न हो तो अशुभ फल देता है.

२. जल – जो मिटटी के साथ मिल जाये तो कीचड़ बनता है और उसी जल को पूजा के पात्र में रखे तो भगवन के अभिषेक के कम आता है.

३. वायु पवन – जो एक बाग़ पे से गुजरेगा तो अगल बगल में खुशबु फैलाएगा और गन्दगी से गुजरेगा तो बदबू फैलाएगा.

४. वस्त्र – जो एक शव पर गया तो कफ़न बनता है और दुल्हे पर गया तो उसका वेश बनता है.
५. औषधि – जो पहुचे हुए बैद के हाथ में जाये तो करिश्मा करती है और गलत बैद के हाथ में जाये तो बुरा परिणाम ला सकती है.

कोई ऐसे सदगुरु का आश्रय करना जो निरंतर हमारा ध्यान रखे. आदमी में गुरुकृपा से एक ऐसी स्विच आ जाती है जो अपनी कामना को किस स्थिति में किस नंबर पर रखना सिखाती है.
प्रेम रूपी औषध का लक्षण..
१. बलिदान दे लेकिन कभी बदला न ले.
२. प्रेम जो प्रदर्शन नहीं करेगा वो दर्शन करेगा.

पवित्रता + प्रसन्नता = परमात्मा
जब ह्रदय में पवित्रता है और मन में प्रसन्नता है बस उस समय परमात्मा है.

जहा ये छे वस्तु होती है वह देवताओ की सहाय उतरती है.
१. उद्दयम  – जरूरी है जिससे हम कुछ पा सके.
२. साहस – भक्ति मार्ग में साहस नितांत आवश्यक है और उसके साथ में सहनशीलता भी.
३. धैर्य – धीरज भी होना चाहिए.
४. बुद्धि – परमात्मा के नाम से बार बार बुद्धि को पवित्र रखना. यज्ञ दान और ताप भी बुद्धि को पवित्र करते है.
५. शक्ति
६. पराक्रम

कलियुग का सबसे बड़ा औषध है हरिनाम हरिनाम हरिनाम.
इति त्रिसत्य.

निरोगी हो गए उसका प्रमाण –
जब भूख लगने लगे सदबुद्धि की.
जब विषय की आशा रूपी दुर्बलता चली गयी.
निर्मल विवेक जल से स्नान करने लगा.

हमारे सदगुरु बैद है. यदि वो कोई बात कहते है तो निरोगी होने के लिए उनपर विश्वास रखना.

भागवत में कहे गए चार सूत्र.
१. इश्वर से प्रेम करो.
२. वैष्णव जन, सात्त्विक जन से मैत्री को.
३. जो बालिश है उनपर करुणा करो.
४. द्वेषी, पाप ग्रस्त उनकी उपेक्षा करो.

औषध है ये बाते दोहावली अनुसार
१. सैयम
२. जप – माला पर जप करना अपने आपको शांत रखना.
३. तप – मुस्कराहट के साथ सहन कर लेना, आप प्रमाणिक और निर्दोष हो तो भी.
४. नेम
५. धर्म
६. व्रत

हमेशा प्रसन्नता बनाये रखने के लिए पतंजलि के चार सूत्र
१. शौच – हम अपने आप को पवित्र करे. यदि रोगी न होना हो तो गन्दगी ही न करे.

२. तप – जो आदमी थोडा तपेगा तो निरोगी बनेगा.

३. तितिक्षा – किसी ने गाली दी तो दी हम क्यों उसपर तर्क वितर्क करे.
४. मौन – चित्त को प्रसन्ना रखना है तो थोडा मौन रहो, कम बोलो.
५. स्वाध्याय – निरंतर पाठ करो. जो सुना है उसका चिंतन मनन करो.
६. आर्जवं – सरलता रोग नहीं होने देगी. स्वभाव सरल होना चाहिए इससे मन की कुटिलता का रोग नहीं आएगा.
७. ब्रह्मचर्य ब्रह्म का स्मरण, चिंतन और मनन.

८. अहिंसा – आदमी का मन भीतर से अहिंसक होगा. भीतर से संकल्प करो की मै किसी को न छलू, किसीकी पीड़ा हरु, किसीका भी दिल न दुखाऊ.
९. समत्व – जीवन में जितना जितना द्वंद्व आये उसमे सम रहना.

गुरुकृपा से यदि हम एक फार्मूला को स्वीकारे तो मानसिक रोगों के आने का द्वार ही न होगा.

ज्ञान जब आसू में परिवर्तित हो जाये. जीवन का सर्वांग ज्ञानमय हो. ज्ञान रूपी गंगा में नख शिख नहाना. इस तरह जब आदमी का ज्ञान पिघले तब समझना भक्ति उर में छा गयी. ये सब निरोगिता के प्रतीक है.

जिन जिन लोगो ने भक्ति मार्ग को पकड़ लिया, उनकी प्रतिष्ठा को तोड़ने का समाज बहुत प्रयत्न करता है. लेकिन भक्त की प्रतिष्ठा नहीं जलती, जगत की ये लंका जल जाती है.

भक्ति कभी भी प्रलोभन से नहीं मिलती.

जहा प्रेम होता है वह त्याग होता है और जहा त्याग होता है वह भीतरी वैराग्य बल बढ़ता है बढ़ता है.

चित्रकूट स्वयं एक औषधि है. यहाँ चित्त को ही चित्रकूट कहा गया है. चित्त वृत्ति का निरोध चैतसिक सय्यम एक औषधि ही तो है.

 

प्रिय मित्रो,

बापू से आस्था के माध्यम से सुनी है ये सब बाते, सो यहाँ लिख रहा हु. यदि आपको लगता है की कही समझने में गलती हुई है तो ठीक कर देना जी.

 

महर्षि पतंजलि के नियम –

१. पवित्रता

२. संतोष

३. तप

४. स्वाध्याय

५. शौच

६. इश्वर प्रणिधान

योग मार्ग में संतोष नियम है तो भक्ति मार्ग में संतोष आठवी भक्ती है.

जो संतोष नहीं रखते उनके प्रति भी संतोष रखना चाहिए.

 

प्रवृत्ति भी ठीक है, निवृत्ति भी ठीक है, पर इन दोनों में सद्वृत्ति रहनी चाहिए.

यदि हम किसी महापुरुष की नक़ल कोई लाभ उठाने के लिए कर रहे है, तो यह गलत बात है.

यदि हमें कोई लाभ की चाह नहीं है तो नक़ल भी ठीक ही है.

 

इन चीजो को फेरते रहना अच्छा होता है…

घोडा

रोटी

पान

माला

 

गुरु चरणों के कणों को मानस में निम्नलिखित उपमाए दी गयी है..

१. पराग – यहाँ तात्पर्य फूल के सामान खिलने से है

२. धुल – यहाँ तात्पर्य धरती के सामान क्षमाशील और उपकारी बनने से है.

३. रज – यहाँ गुरु पद की सूक्ष्मता समझनी चाहिए.

४. रेणु – यहाँ अर्थ है की गुरु के बताये हुए रस्ते पर पड़े रहो.

 

दीक्षा का अर्थ है परम स्वातंत्र्य.

 

मूल में रहो फूल शाखाओ में नहीं, वह व्यवस्था का भाग है.

 

शास्त्र और राजा किसीके वश नहीं होते.

 

राज रोग का शमन सुवर्ण भस्म है.

 

दुःख के कारण –

१. आभाव

२. अन्याय

३. अज्ञान

 

आदिवासियों की कसरते ध्यान के बिना संभव नहीं.

 

अभिमत – अपने मत को पूरा करने वाला.

 

विनोबा भावे कहते है की नारियल फोड़ने के लिए जो घाव पहले किये जाते है वो व्यर्थ है और जो आखरी घाव है वो हे कारगर है ऐसा नहीं है. पहले के घावो ने भी नारीयल की मजबुती तोड़ी है.

 

कोई भी काम सफल होने के लिए तीन बाते जरूरी है..

१. व्यवस्था – इसका सम्बन्ध कर्म से है.

२. अवस्था – इसका सम्बन्ध मन से है.

३. आस्था – इसका सम्बन्ध अध्यात्म से है.

 

इश्वर है की नहीं चिंता नहीं, श्रद्धा तो है.

 

बुद्धि यह बहिर्मुख चेतना है.

 

श्रद्धा यह अंतर्मुख चेतना है.

 

पाप के मूल …

१. मूढ़ता

२. कुटिलता

३. हिंसा

४. कुचाली जैसे शकुनी और मंथरा

५. दुर्बुद्धि

 

नौ प्रकार की भक्ति

१. श्रवण २ कीर्तन ३. स्मरण ४. पाद सेवन ५. अर्चन ६. वंदन ७. दास्य ८. सख्य ९. आत्म निवेदन

 

दर्शन यह भक्ति का सार है.

 

सुबह उठकर कर दर्शन करना चाहिए, हमारे कर कोई गलत कम नहीं करेंगे ऐसा प्रण करना चाहिए.

 

महर्षि विश्वामित्र को जब महाराज दशरथ कहते है की मै सेवक, पुत्र और नारी सहित आपका हूँ, तो उनका तात्पर्य कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग से है.

 

राम को वनवास क्यों हुआ ऐसा प्रश्न जब निषाद ने लक्ष्मण से किया तो जवाब मिला की क्या सूर्य वंश में उत्पन्न होने वाले वातानुकूलित जगहों में रहेंगे. वो तो तपेंगे और दूसरो को सुख देंगे.

 

जब जोई गृहिणी खाना बनती है तो तीनो योग जरुरी है..
१. ज्ञान योग. – उसे खाना बनाने की विधि का ज्ञान होना चाहिए.
२. कर्म योग – उसने खाना बनाने के लिए आवश्यक कर्म करने चाहिए.
३. भक्ति योग – उसके मन में यह भाव होना चाहिए की भोजन खाने वाला तृप्त हो जाये.

अपनी जितनी औकात है उतना कर्म करना वो कर्म योग.

नागरिको में निम्न लिखित गुण होने चाहिए
१. सहनशील
२. संवेदनशील
३. स्वप्नशील
४. सर्जनशील
५. सत्यशील

हमारी लार टपकनी नहीं चाहिए याने किसीसे कोई अपेक्षा नहीं होनी चाहिए.
हमने लार किसी पर थूकनी भी नहीं चाहिए याने किसीकी उपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए.

दक्ष की कन्या बुद्धि, हिमालय की कन्या श्रद्धा

हनुमान का राजधर्म है की राम के पास ले जाते है.
सुग्रीव को भी ले गए.
पहले राम (सत्य, प्रेम, करुणा) फिर राज
सोये हुए को जागृत जगाता है, जैसे सुग्रीव को लक्ष्मण ने जगाया
जब जागृत सो जाता है, हनुमान जगाते है. जैसे लक्ष्मण को हनुमान ने जगाया.

हमने यहाँ देखी है किस्म किस्म की नजरे
चकोर चाँद जैसी कोई डगर ढूंढते है

हनुमान ने रावन को समझाया, अपहरण से कल्याण नहीं हो सकता समर्पण से होता है.

गांधीजी ने अपने आचरण से यह बताया की पुरुषार्थ के साथ प्रार्थना होनी चाहिए.

आनंद महलों में नहीं होता मन में होता है.

हम किस स्थान में है इससे कुछ फरक नहीं पड़ता, हा इससे फरक पड़ता है की हमारी दृष्टि कैसी है.

यदि दृष्टि कैकयी की  है तो अयोध्या में भी मंथरा के दर्शन हो जाते है और यदि दृष्टी हनुमान की है तो लंका में भी विभीषण जैसे संत से मुलाक़ात हो जाती है.

 

जब हम किसी संकट में होते है तो धरती से जुडी हुई बाते ही हमें उभारती है, हवा की बाते नहीं.

सीताजी लंका में थी. रावण जैसा राक्षस उसे डरा धमका रहा था. सीताजी ने रावण को तृण की पात दिखाई. यहाँ संकेत धरातल से जुड़ने का हैं. जब हम धरातल से जुड़ते है तो हनुमान जैसी दैवी शक्ति हमारी रक्षा के लिए हमारे पीछे प्रकट हो जाती है.

 

भगवान से मुलाक़ात का फल अच्छा ही निकले यह जरूरी नहीं हैं.

सती ने भगवान राम की परीक्षा करने के लिए मुलाक़ात की. इसका अंजाम यहाँ हुआ की भगवान शंकर ने उन्हें त्याग दिया.

शुर्पनखा ने प्रभु से मुलाक़ात की तो उसके नाक कान कट गए.

इसीलिए गांधीजी ने साधन शुचिता की बात की है.

 

दक्ष को भगवान शंकर पर क्रोध था. एक बार देवो की सभा में जब दक्ष ने प्रवेश किया तो सभी उठकर खड़े हुए. भगवान शंकर ध्यान में थे इसलिए खड़े नहीं हुए. दक्ष का अपमान हो गया. अहंकारी व्यक्ति का सम्मान सौ लोगो के खड़े होने से नहीं होता है लेकिन एक के खड़े न होने से उसका अपमान हो जाता है.

दक्ष ने यज्ञ का आयोजन भगवान शंकर को अपमानित करने के लिए किया. अंततः यज्ञ का विध्वंस हो गया.

यदि उद्देश्य ठीक नहीं है तो अच्छे कार्यो का भी विध्वंस हो जाता है.

 

शुर्पनखा जब भगवान से मिलने गयी तो उसके नाक कान कट गए. इसका संकेत इस ओर है की हम जब आतंरिक रूप से शुद्ध नहीं होते है और भगवान के सामने पवित्र रूप में प्रकट होते है तो कालांतर में हम विद्रूप हो जाते है.

 

हनुमानजी ने सीताजी को जो मुद्रिका दी थी वह भगवान के पास गंगाजी को पार करते समय आयी थी. केवट ने प्रभु को सीता, लक्ष्मण समेत गंगा पार कराया. प्रभु वनवासी थे सो देने के लिए उनके पास कुछ न था. उन्होंने सीताजी से मुद्रिका मांगी और केवट को देना चाही. केवट ने लेने से इंकार कर दिया. वही मुद्रिका प्रभु ने हनुमान को सीताजी को देने के लिए दी. इस प्रकार वह मुद्रिका सीताजी के पास वापस आई. यहाँ केवट और हनुमान की भक्ति के सुक्ष्म भावो को समझे और भक्ति रूपी मुद्रिका को पाने के लिए अधिकार को जाने.

 

जब हमारा कोई सम्मान करता है तो इसे हम हमारा बड़प्पन न समझ बैठे. यह तो सम्मान देने वाले का बड़प्पन है कि वह विनयशील है.

 

सीता ने पार्वती की पूजा की, तो ऐसा लिखा है की सीता की भक्ति देखकर मुर्ती मुस्कुरायी. विद्वानों को इस पर आक्षेप है कि मुर्ती मुस्कुरा कैसे सकती है. हा उन लोगो को कैसे पता चले कि मुर्ती मुस्कुराती है जिन्हें देखकर बाहरवाले तो क्या उनके घरवाले भी नहीं मुस्कुराते, अजी मुस्कुराना तो छोडिये उनसे बात भी नहीं करते.

 

जब हनुमान लंका की ओर उड़ान भर के जा रहे थे तो उनकी भेट एक राक्षसी से हुई. यह राक्षसी समुद्र के ऊपर से उड़ने वाले पक्षियों को मारकर खाती थी. वह उडते पक्षी की परछाई को पकड़ लेती और फिर उसे निचे गिराकर मार डालती. यह राक्षसी कोई और नहीं बल्कि हमारे भीतर रहने वाली इर्ष्या है. राक्षसी समुद्र के प्राणियों को नहीं मारती है. वह जो जीव ऊंचाई पर है उन्हें मारती है. हम हमारी बराबरी के लोगो से इर्ष्या नहीं करते है. उनसे इर्ष्या करते है जो ऊपर उठे हुए है. हम उनकी हर परछाई पर नजर रखते है और उन्हें निचे गिराने की कोई कसर नहीं छोड़ते. हनुमानजी ने इस राक्षसी का अंत कर दिया. हनुमानजी के दर्शन होने से ही हमारी इर्ष्या का अंत हो सकता है.

 

इन्द्र का लड़का जयंत प्रभु का दर्शन करने के लिए चित्रकूट गया. वह कौवे का रूप धारण कर के गया. प्रभु एकांत में सीता के साथ बैठे थे. जयंत में उनको देखकर गलत भाव जागे और उसने सीता के पैर की ऊँगली में चोच मारी. हम जब भी किसीके यहाँ निमंत्रण पर जाते है तो हम भी दर्शन करने की जगह इधर उधर चोच मारने में ही रूचि दिखाते है.

प्रभु ने जब यह देखा तो जयंत की ओर उन्होंने एक घास का बाण छोड़ दिया. जयंत अपनी जान बचाने के लिए भागा. वह ब्रह्माजी के पास गया, शिवजी के पास गया लेकिन उसे कोई सुरक्षा नहीं मिली. तब वह अपने पिता इन्द्र के पास गया. इन्द्र ने उससे कहा की तुने अपराध प्रभु का किया है तो इधर उधर क्यों भाग रहा है, जाके प्रभु से क्षमा मांग. हमने इससे यह बोध लेना चाहिए कि हमने यदि किसीका अपराध किया है तो जाके उससे क्षमा मंगनी चाहिए ना की इधर उधर दौड़ना चाहिए.

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